श्री महाप्रभुजी का बड़ा मंदिर, कोटा ( राजस्थान ) आपका स्वागत करता है
|अधिकारिक वेबसाइट|

मंदिर के बारे में

देश में वल्लभ सम्प्रदाय के यूं तो अनेक मंदिर हैं परंतु कोटा के पाटनपोल स्थित महाप्रभु जी मंदिर देशभर में वल्लभ सम्प्रदाय का ऐसा एकमात्र स्थल है, जहां ‘अखण्ड भूमंडलाचार्यवर्य’ श्रीमद् वल्लभाचार्य जी की चरण पादुका सेवित है, इसीलिए इसे ‘महाप्रभु जी की बडी गादी’ के रूप में मान्यता प्राप्त है।
पुष्टिमार्ग में ‘गृह स्थित्वा स्वधर्मतः’ अर्थात् अपने घर ही रहकर भगवत सेवा करने का आदेश है, अतः मंदिरों को भी ‘निजीघर’ कहा जाता है। इसी तरह मंदिरों में जो मूर्तियां हैं, उन्हें भी प्रतिमा न कहकर ‘तद्रूप’ या ‘स्वरूप’ ही माना जाता है। इस मत में चार ग्रंथों वेद, पुराण, भागवत एवं गीता को ही प्रमाण माना जाता गया है, जो पुष्टिमार्ग के सिद्धांतों की सनातनता को पुष्ट करते हैं। यह सिद्धांत है कि लीला में गुण-दोष नहीं, उत्तमता ही देखें, परवाह सिर्फ स्वामी के सुख की करें तथा सर्वस्व समर्पण भाव का ही पोषण करें। यही विधान महाप्रभु जी मंदिर में भी चल रहा है। इस मंदिर में वर्तमान पीठाधीश गोस्वामी श्रीश्री बृजालंकार जी महाराज श्री हैं, हैं। आप श्री मंदिर में सेवा-सुश्रुषा के साथ ही महाप्रभु जी का देशभर में संदेश पहुंचाने के लिए प्रायः भ्रमण करते रहते हैं। मंदिर की स्थापना के बारे में कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है, लेकिन आचार्य ब्रजाभरण दीक्षित के समय के लेखों में इसका जिक्र मिलता है। दीक्षित जी ने पोडष ग्रंथों की टीका लिखी और वे आज से लगभग 300 वर्ष पूर्व पैदा हुए। श्री बृजालंकार जी का कहना है कि यह मंदिर इससे भी पुराना होगा, लेकिन इतना प्राचीन तो मानना ही पडेगा। मंदिर में गौशाला बगीचा, कचहरी डोल तिवारी है, तो निज तिवारी और निज मंदिर के साथ ही कीर्तन तिवारी भी है, जिसमें अलग-अलग अनुष्ठान होते हैं। इस बडी प्राचीन हवेली में विशाल कमल चौक किसी बडे आयोजन में एकत्र जनसमुदाय को भी आसानी से समेट लेता है। सिंहपोल तथा हथियापोल भी दर्शनीय है। सिंहपोल पर जहां शेर बने हैं, वहीं हथियापोल में गज स्थापित हैं। मुख्यद्वार पर तीन सीढियां - राजस, तामस और सात्विक भावों का प्रतीक हैं। इनका क्रमशः पराभव कर ही वैष्णव जन सेवा में अनुरक्त होते हैं। इसी तरह मंदिर के विभिन्न हिस्सों में बने सात दरवाजों को पार कर मुख्य देवालय में पहुंचा जाता है। पूरे मंदिर का स्थापत्य वही हैं, जो नंदराय के घर का है, जिसे आज भी नंदग्राम और बरसाने में सुरक्षित रखा गया है। पुष्टिमार्ग के भगवान श्री कृष्ण की ग्यारह वर्ष तक की ‘बालस्वरूप’ लीलाओं को ही ‘पूर्ण पुरूषोत्तम’ माना गया है और इनका ही अवगाहन किया जाता है। ये लीलाएं वे हैं जो गोपाल ने ब्रजमंडल के अन्दर की। इसके बाद की उनकी लीलाएं संकर्षण, अनिरूद्ध, वासुदेव एवं प्रद्युम्न कही जाती है, जो उन्होंने मथुरा तथा द्वारिका में की। इसी आस्था के अनुरूप महाप्रभु जी मंदिर में भी कुल आठ स्वरूप विद्यमान है। इसमें गुसाई जी की पादुका है, नवनीत लाल जी का स्वरूप है जो मनमोहन लाल जी युगल स्वरूप में मौजूद है। चार स्वरूप बालकृष्ण लाल जी के हैं, तो तीन लालन के स्वरूप हैं। मंदिर के क्रियाकलापों के बारे में पूछने पर श्री बृजालंकार जी बताते हैं कि भगवान के सुख का विचार करना ही सेवा है। उनके सुख में जो भी बन पडता है, वह करता हूं। मंदिर में सुशोभित स्वरूपों के बारें में उन्होंने बताया कि ये सब ‘निधिस्वरूप’ हैं, अर्थात् मथुरा में यमुना नदी में स्नान करते हुए वैष्णवों के आंचल में आये थे। इन्हें किसी मूर्तिकार ने नहीं बनाया। किसी के हाथों बनी प्रतिमाओं को ‘पुष्टि स्वरूप’ माना जाता है। यहां मौजूद इन मूर्तियों के बारे में श्री बृजालंकार जी का दावा है कि ये 500 वर्ष पुरानी हैं। श्री बृजालंकार जी बताते हैं अन्य मतावलम्बियों के विपरीत पुष्टि मार्ग में मंदिर के अन्दर भक्तों की ओर से कुछ भी निर्माण निषिद्ध है। श्रद्धालु वैष्णव सेवा कृतिर्गुराराज्ञा के आदेशानुसार नकद राशि भेंट कर जाते हैं। इसलिए ऐसे देवालयों में कही भी किसी सेठ या जागीरदार के नाम की पट्टिका नजर नहीं आयेगी। गुरू के माध्यम से ही मंदिर का जीर्णोद्धार होता है।महाप्रभु मंदिर में अन्य वैष्णव मंदिरों की तरह तडके मंगल भोग कुछ समय बाद श्रगार, फिर ग्वाल तथा उसके उपरान्त प्रातः की अन्तिम सबसे सुन्दर और - ज्यादा लम्बी चलने वाली झांकी के दर्शन होते हैं। अपरान्ह 3 बजे बाद उत्थापन के दर्शन सायंकालीन दर्शनों की पहली झांकी होती है। इसके बाद भोग शाम के दूसरे दर्शन की संध्या आरती शाम की तीसरी झांकी होती है। शयन अन्तिम - -दर्शन होते हैं, जो काफी समय चलते हैं। मंगल भोग में दूध, मक्खन आदि का भोग लगाया जाता है। श्रृंगार के समय प्रभु को बहुमूल्य वस्त्राभूषणों से सजाया जाता है। उत्थापन के समय प्रभु को जगाने के लिए शंखनाद होता है। भोग में विभिन्न फलों व उच्चकोटि के प्रसाद का भोग लगाया जाता है। संध्या आरती का महत्व राजभोग के समान ही है। शयन के समय आरती होती है तथा सेवा भी ली जाती है। मंदिर में वर्ष भर चलने वाली इन सेवाओं के अतिरिक्त आधा दर्जन विशेष समारोह भी होते हैं। श्रीमद् वल्लभाचार्य जी का जन्म संवत् 1535 की वैशाख वदी ग्यारस को हुआ था। इसी दिन मध्यान्ह काल में श्री गोवर्द्धन नाथ जी का मुखारबिन्द प्रगट हुआ। इसीलिए कहा गया है-


‘‘श्रीवल्लभ पद रेणुको, नामे हुं बारम्बार।
तिनप्रताप मन होत है, महामनोरथ चार।।’’

वल्लभाचार्य की जन्मतिथि को महाजयंती के रूप में मनाया जाता है। उनके- -उत्तराधिकारी गुसाई जी विट्ठलनाथ जी की जयंती कृष्ण नवमी का मनाई जाती है। अन्य चार समारोह कृष्ण जन्माष्टमी, रामनवमी, वामन जयंती तथा नृसिंह जयंती पर होते हैं। दोनों जयंतियों पर ‘पादुकाओं’ को दूध स्नान तथा बाकी चारों कार्यक्रमों में दूध, दही, घी, बूरा व शहद का ‘पंचामृत स्नान’ कराया जाता है। इस मंदिर में पिछले 40 वर्षों से नित्य सत्संग चल रहा है। श्री बृजालंकार जी बताते हैं कि वैष्णवों को यहां 252 वैष्णवों की वार्ता तथा शिक्षा पत्र सुनाया है। मंदिर की भावी योजनाओं के बारे में पूछने पर श्री बृजालंकार जी तनिक मस्कुराते हुए कहते हैः-


‘तस्मादसक्तः सततं कार्य कर्म समाचारं।
असकर्ता हुयाचरन्कर्मं परमाप्नोति पुरूषः’

- अर्थात अनासक्त बनकर हमेशा जीव को करना चाहिए। इसी से वह परमगति को करता है।


देश में वल्लभ

।। श्री महाप्रभु जी ।।

देश में वल्लभ सम्प्रदाय के यूं तो अनेक मंदिर हैं परंतु कोटा के पाटनपोल स्थित महाप्रभु जी मंदिर देशभर में वल्लभ सम्प्रदाय का ऐसा एकमात्र स्थल है, जहां ‘अखण्ड भूमंडलाचार्यवर्य’ श्रीमद् वल्लभाचार्य जी की चरण पादुका सेवित है, इसीलिए इसे ‘महाप्रभु जी की बडी गादी’ के रूप में मान्यता प्राप्त है।
पुष्टिमार्ग में ‘गृह स्थित्वा स्वधर्मतः’ अर्थात् अपने घर ही रहकर भगवत सेवा करने का आदेश है, अतः मंदिरों को भी ‘निजीघर’ कहा जाता है। इसी तरह मंदिरों में जो मूर्तियां हैं, उन्हें भी प्रतिमा न कहकर ‘तद्रूप’ या ‘स्वरूप’ ही माना जाता है। इस मत में चार ग्रंथों वेद, पुराण, भागवत एवं गीता को ही प्रमाण माना जाता गया है, जो पुष्टिमार्ग के सिद्धांतों की सनातनता को पुष्ट करते हैं। यह सिद्धांत है कि लीला में गुण-दोष नहीं, उत्तमता ही देखें, परवाह -

पृष्ठ-2

-सिर्फ स्वामी के सुख की करें तथा सर्वस्व समर्पण भाव का ही पोषण करें। यही विधान महाप्रभु जी मंदिर में भी चल रहा है। इस मंदिर में वर्तमान पीठाधीश गोस्वामी श्रीश्री बृजालंकार जी महाराज श्री हैं । आप श्री मंदिर में सेवा-सुश्रुषा के साथ ही महाप्रभु जी का देशभर में संदेश पहुंचाने के लिए प्रायः भ्रमण करते रहते हैं। मंदिर की स्थापना के बारे में कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है, लेकिन आचार्य ब्रजाभरण दीक्षित के समय के लेखों में इसका जिक्र मिलता है। दीक्षित जी ने पोडष ग्रंथों की टीका लिखी और वे आज से लगभग 300 वर्ष पूर्व पैदा हुए। श्री बृजालंकार जी का कहना है कि यह मंदिर इससे भी पुराना होगा, लेकिन इतना प्राचीन तो मानना ही पडेगा। मंदिर में गौशाला-

पृष्ठ-3

- बगीचा, कचहरी डोल तिवारी है, तो निज तिवारी और निज मंदिर के साथ ही कीर्तन तिवारी भी है, जिसमें अलग-अलग अनुष्ठान होते हैं। इस बडी प्राचीन हवेली में विशाल कमल चौक किसी बडे आयोजन में एकत्र जनसमुदाय को भी आसानी से समेट लेता है। सिंहपोल तथा हथियापोल भी दर्शनीय है। सिंहपोल पर जहां शेर बने हैं, वहीं हथियापोल में गज स्थापित हैं। मुख्यद्वार पर तीन सीढियां - राजस, तामस और सात्विक भावों का प्रतीक हैं। इनका क्रमशः पराभव कर ही वैष्णव जन सेवा में अनुरक्त होते हैं। इसी तरह मंदिर के विभिन्न हिस्सों में बने सात दरवाजों को पार कर मुख्य देवालय में पहुंचा जाता है। पूरे मंदिर का स्थापत्य वही हैं, जो नंदराय के घर का है, जिसे आज भी नंदग्राम और बरसाने में सुरक्षित रखा गया है। पुष्टिमार्ग के भगवान श्री कृष्ण की ग्यारह वर्ष तक की -

पृष्ठ-4

-‘बालस्वरूप’ लीलाओं को ही ‘पूर्ण पुरूषोत्तम’ माना गया है और इनका ही अवगाहन किया जाता है। ये लीलाएं वे हैं जो गोपाल ने ब्रजमंडल के अन्दर की। इसके बाद की उनकी लीलाएं संकर्षण, अनिरूद्ध, वासुदेव एवं प्रद्युम्न कही जाती है, जो उन्होंने मथुरा तथा द्वारिका में की। इसी आस्था के अनुरूप महाप्रभु जी मंदिर में भी कुल आठ स्वरूप विद्यमान है। इसमें गुसाई जी की पादुका है, नवनीत लाल जी का स्वरूप है जो मनमोहन लाल जी युगल स्वरूप में मौजूद है। चार स्वरूप बालकृष्ण लाल जी के हैं, तो तीन लालन के स्वरूप हैं। मंदिर के क्रियाकलापों के बारे में पूछने पर श्री बृजालंकार जी बताते हैं कि भगवान के सुख का विचार करना ही सेवा है। उनके सुख में जो भी बन पडता है, वह करता हूं। मंदिर में सुशोभित स्वरूपों के बारें में उन्होंने बताया कि ये सब ‘निधिस्वरूप’ हैं, अर्थात् -

पृष्ठ-5

-मथुरा में यमुना नदी में स्नान करते हुए वैष्णवों के आंचल में आये थे। इन्हें किसी मूर्तिकार ने नहीं बनाया। किसी के हाथों बनी प्रतिमाओं को ‘पुष्टि स्वरूप’ माना जाता है। यहां मौजूद इन मूर्तियों के बारे में श्री बृजालंकार जी का दावा है कि ये 500 वर्ष पुरानी हैं। श्री बृजालंकार जी बताते हैं अन्य मतावलम्बियों के विपरीत पुष्टि मार्ग में मंदिर के अन्दर भक्तों की ओर से कुछ भी निर्माण निषिद्ध है। श्रद्धालु वैष्णव सेवा कृतिर्गुराराज्ञा के आदेशानुसार नकद राशि भेंट कर जाते हैं। इसलिए ऐसे देवालयों में कही भी किसी सेठ या जागीरदार के नाम की पट्टिका नजर नहीं आयेगी। गुरू के माध्यम से ही मंदिर का जीर्णोद्धार होता है।महाप्रभु मंदिर में अन्य वैष्णव मंदिरों की तरह तडके मंगल भोग कुछ समय बाद श्रगार, फिर ग्वाल तथा उसके उपरान्त प्रातः की अन्तिम सबसे सुन्दर और-

पृष्ठ-6

- ज्यादा लम्बी चलने वाली झांकी के दर्शन होते हैं। अपरान्ह 3 बजे बाद उत्थापन के दर्शन सायंकालीन दर्शनों की पहली झांकी होती है। इसके बाद भोग शाम के दूसरे दर्शन की संध्या आरती शाम की तीसरी झांकी होती है। शयन अन्तिम - -दर्शन होते हैं, जो काफी समय चलते हैं। मंगल भोग में दूध, मक्खन आदि का भोग लगाया जाता है। श्रृंगार के समय प्रभु को बहुमूल्य वस्त्राभूषणों से सजाया जाता है। उत्थापन के समय प्रभु को जगाने के लिए शंखनाद होता है। भोग में विभिन्न फलों व उच्चकोटि के प्रसाद का भोग लगाया जाता है। संध्या आरती का महत्व राजभोग के समान ही है। शयन के समय आरती होती है तथा सेवा भी ली जाती है। मंदिर में वर्ष भर चलने वाली इन सेवाओं के अतिरिक्त आधा दर्जन विशेष समारोह भी होते हैं। श्रीमद् वल्लभाचार्य जी का जन्म संवत् 1535 की-

पृष्ठ-7

-वैशाख वदी ग्यारस को हुआ था। इसी दिन मध्यान्ह काल में श्री गोवर्द्धन नाथ जी का मुखारबिन्द प्रगट हुआ। इसीलिए कहा गया है-
          ‘‘श्रीवल्लभ पद रेणुको, नामे हुं बारम्बार।
          तिनप्रताप मन होत है, महामनोरथ चार।।’’

वल्लभाचार्य की जन्मतिथि को महाजयंती के रूप में मनाया जाता है। उनके- -उत्तराधिकारी गुसाई जी विट्ठलनाथ जी की जयंती कृष्ण नवमी का मनाई जाती है। अन्य चार समारोह कृष्ण जन्माष्टमी, रामनवमी, वामन जयंती तथा नृसिंह जयंती पर होते हैं। दोनों जयंतियों पर ‘पादुकाओं’ को दूध स्नान तथा बाकी चारों कार्यक्रमों में दूध, दही, घी, बूरा व शहद का ‘पंचामृत स्नान’ कराया जाता है। इस मंदिर में पिछले 40 वर्षों से नित्य सत्संग चल रहा है। श्री बृजालंकार जी बताते हैं कि वैष्णवों को यहां-

पृष्ठ-8

-252 वैष्णवों की वार्ता तथा शिक्षा पत्र सुनाया है। मंदिर की भावी योजनाओं के बारे में पूछने पर श्री बृजालंकार जी तनिक मस्कुराते हुए कहते हैः-
           ‘तस्मादसक्तः सततं कार्य कर्म समाचारं।
           असकर्ता हुयाचरन्कर्मं परमाप्नोति पुरूषः’’
- अर्थात अनासक्त बनकर हमेशा जीव को करना चाहिए। इसी से वह परमगति को करता है।

नमामि यमुनामहं सकल सिद्धि हेतुं मुदा ।
मुरारि पद पंकज स्फ़ुरदमन्द रेणुत्कटाम ।।

श्री कृष्ण: शरणं ममः