श्री महाप्रभुजी का बड़ा मंदिर, कोटा ( राजस्थान ) आपका स्वागत करता है
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श्री नित्य लिलास्थ
पूज्यपाद गोस्वामी श्री पुरुषोत्तम लाल जी महाराज श्री
पूज्यपाद गोस्वामी श्री
पूज्यपाद गोस्वामी श्री गोपाल लाल जी महाराज श्री
गोस्वामी श्री
गोस्वामी श्री बृजालंकार जी श्री विनय बावा श्री

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 दर्शन समय  

प्रतिदिन
मंगला प्रातः 7.00 A.M
राजभोग प्रातः  9.00 A.M
आरती सायं  4.45 P.M
विशेष नोट : 

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इतिहास

देश में वल्लभ सम्प्रदाय के यूं तो अनेक मंदिर हैं परंतु कोटा के पाटनपोल स्थित महाप्रभु जी मंदिर देशभर में वल्लभ सम्प्रदाय का ऐसा एकमात्र स्थल है, जहां ‘अखण्ड भूमंड-लाचार्यवर्य’  श्रीमद् वल्लभाचार्य जी की चरण पादुका सेवित है, इसीलिए इसे ‘महाप्रभु जी की बडी गादी’  के रूप में मान्यता प्राप्त है।
पुष्टिमार्ग में ‘गृह स्थित्वा स्वधर्मतः’ अर्थात् अपने घर ही रहकर भगवत सेवा करने का आदेश है, अतः मंदिरों को भी ‘निजीघर’ कहा जाता है। इसी तरह मंदिरों में जो मूर्तियां हैं, उन्हें भी प्रतिमा न कहकर ‘तद्रूप’ या ‘स्वरूप’ ही माना जाता है। इस मत में चार ग्रंथों वेद, पुराण, भागवत  एवं गीता को ही प्रमाण माना जाता गया है, जो पुष्टिमार्ग के सिद्धांतों की सनातनता को पुष्ट करते हैं । इस मंदिर में वर्तमान पीठाधीश गोस्वामी श्रीश्री बृजालंकार जी महाराज श्री हैं । आप श्री मंदिर में सेवा-सुश्रुषा के साथ महाप्रभु जी का देशभर में संदेश पहुंचाने के लिए प्रायः भ्रमण करते रहते हैं ।
मंदिर की स्थापना के बारे में कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है, लेकिन आचार्य ब्रजाभरण दीक्षित जी के समय के लेखों में इसका विवरण मिलता है । दीक्षित जी ने पोडष ग्रंथों की टीका लिखी और वे आज से लगभग 300 वर्ष पूर्व पैदा हुए।
श्री बृजालंकार जी महाराज श्री का कहना है कि यह मंदिर इससे भी पुराना होगा, लेकिन इतना प्राचीन तो मानना ही पडेगा । मंदिर में गौशाला, बगीचा, कचहरी, डोल व तिवारी है, निज तिवारी और   ..............आगे पढ़ें

देश में वल्लभ सम्प्रदाय के यूं तो अनेक मंदिर हैं परंतु कोटा के पाटनपोल स्थित महाप्रभु जी मंदिर देशभर में वल्लभ सम्प्रदाय का ऐसा एकमात्र स्थल है, जहां ‘अखण्ड भूमंड-लाचार्यवर्य’  श्रीमद् वल्लभाचार्य जी की चरण पादुका सेवित है, इसीलिए इसे ‘महाप्रभु जी की बडी गादी’  के रूप में मान्यता प्राप्त है।
पुष्टिमार्ग में ‘गृह स्थित्वा स्वधर्मतः’ अर्थात् अपने घर ही रहकर भगवत सेवा करने का आदेश है, अतः मंदिरों को भी ‘निजीघर’ कहा जाता है। इसी तरह मंदिरों में जो मूर्तियां हैं, उन्हें भी प्रतिमा न कहकर ‘तद्रूप’ या ‘स्वरूप’ ही माना जाता है। इस मत में चार ग्रंथों वेद, पुराण, भागवत  एवं गीता को ही प्रमाण माना जाता गया है, जो पुष्टिमार्ग के सिद्धांतों की सनातनता को पुष्ट करते हैं । इस मंदिर में वर्तमान पीठाधीश गोस्वामी श्रीश्री बृजालंकार जी महाराज श्री हैं । आप श्री मंदिर में सेवा-सुश्रुषा के साथ महाप्रभु जी का देशभर में संदेश पहुंचाने के लिए प्रायः भ्रमण करते रहते हैं । मंदिर की स्थापना के बारे में कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है, लेकिन आचार्य ब्रजाभरण दीक्षित जी के समय के लेखों में इसका विवरण मिलता है । दीक्षित जी ने पोडष ग्रंथों की टीका लिखी और वे आज से लगभग 300 वर्ष पूर्व पैदा हुए।
श्री बृजालंकार जी महाराज श्री का कहना है कि यह मंदिर इससे भी पुराना होगा, लेकिन इतना प्राचीन तो मानना ही पडेगा । मंदिर में गौशाला, बगीचा, कचहरी, डोल व तिवारी है, निज तिवारी और   ..............आगे पढ़ें

नमामि यमुनामहं सकल सिद्धि हेतुं मुदा ।
मुरारि पद पंकज स्फ़ुरदमन्द रेणुत्कटाम ।।

श्री कृष्ण: शरणं ममः