श्री महाप्रभुजी का बड़ा मंदिर, कोटा ( राजस्थान ) आपका स्वागत करता है
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श्रीमद् वल्लभाचार्य महाप्रभु जी


प्रथम श्रीवल्लभाचार्यचरण भूतलपर प्रगटे तामें हेतु प्रकृति मंडलते परे अक्षर ब्रह्माके विषे व्याप्त वैकुंठ भगवतधाम है ताके गोलोकधाम नाम करके वेद पुराणादिकमें वर्णन है तहां रमणकर्ता श्रीकृष्ण भगवान  एक समयमें करुणारस वशहोयके विचार करते भये। हमारा आत्मानुभावप्रभाव वेद उपनिषदके विषे जो शुध्दाव्दैत मत है। सो संप्रति भूतलके विषे तिरोहित होय गयाहै। मायावादिनने वेदकी श्रुतिनके अर्थको अनर्थ किया है तातें भगवतधर्म लुप्त भयोहै। सो शुध्दाव्दैत मत प्रगट करने के लिए और पुष्टि भक्तियोग को दान देने के लिए और देवीजीव को उध्दार करने के लिए मैं प्रकट होऊं। ---------------------------------------------------------------------------ब्राह्मणोत्पत्तिमार्तण्ड   


शुद्धाद्वैत ब्रह्मवाद के व्याख्या और पुष्टिमार्ग के संस्थापक श्रीमद् वल्लभाचार्यजी का प्राकट्य वैशाख कृष्ण एकादशी वि.स. १५३५/1535 (ईस्वी सन् १४७८/1478) को हुआ था।
                       
आपके पिता श्री लक्ष्मण भट्ट और माता इल्लम्मागारू थे। आपके परिवार का मूलतः स्थान आंध्रप्रदेश के खम्मन् के निकट कांकडवाड़ नामक गांव था। आप तैलंग ब्राह्मण थे और कृष्ण यजुर्वेद की तैतरीय शाखा के अन्तर्गत आपका भारद्वाज गौत्र था। आपका परिवार धार्मिक निष्ठा वाला था। आपके परिवार में कई पीढियों से वैदिक सोमयज्ञों की परम्परा चल रही थी। आपके पूर्वज श्री यज्ञनारायण भट्ट ने परिवार में सोमयज्ञ की परम्परा आरम्भ की। उन्हे भगवान् का यह वरदान मिला था कि सौ सोम यज्ञ पूर्ण होने पर मैं आपके परिवार में अवतार लूँगा इस वरदान के सफल होने की प्रतीक्षा में परिवार में पाँच पीडियों तक सोमयज्ञों की अखंड परम्परा चलती रही।

                          सोमयज्ञों की सूची :-
        1. श्री यज्ञनारायण जी भट्ट - 32
        2. श्री गंगाधन भट्ट - 28
        3. श्री गणपति भट्ट - 30
        4. श्री बालम भट्ट - 5
        5. श्री लक्ष्मण भट्ट - 5

श्री लक्ष्मणभट्ट से पाँच पीढी पूर्व इस काल में श्री यज्ञनारायण भट्ट ने ३२/32 सोमयज्ञ किये। इनके पुत्र श्री गंगाधन भट्ट ने २८/28, इनके पुत्र श्री गणपति भट्ट ने ३०/30, इनके पुत्र श्री बालम भट्ट ने ५/5 और इनके पुत्र श्री लक्ष्मण भट्ट ने ५/5 सोमयज्ञ किये।
श्री वल्लभाचार्य के पिता के समय सोमयज्ञों की संखया पूरी हुई। तब श्री वल्लभाचार्यजी का प्राकट्य हुआ।

प्राकट्य

वंश में पाचवी पीढ़ी में श्री लक्ष्मण भट्ट का जन्म हुआ। ये भी अपने पूर्वजों के समान उद्भट विद्वान् थे। इनका विवाह विजयनगर के धर्माधिकारी सुधर्मा की पुत्री इल्लम्मागारू के साथ हुआ। इस दम्पती के रामकृष्ण नाम का एक पुत्र ओर सरस्वती तथा सुभद्रा नाम की दो पुत्रियाँ हुई।
इस समय तक श्री लक्ष्मण भट्ट पांच सोमयज्ञ पूर्ण कर चुके थे। इनकी पूर्ति के साथ ही इस वंश का सौ सोमयज्ञ करने का संकल्प पूरा हो चुका था। श्री लक्ष्मण भट्ट बृहद ब्रह्मभोज का संकल्प लेकर काशी आये। उनके मन मे इस बात से अत्यधिक प्रसन्नता थी कि अब सौ सोमयज्ञ पूर्ण हो जाने पर इनके परिवार में भगवान् का प्राकट्य होगा। श्री लक्ष्मण भट्ट काशी में हनुमानघाट पर एक मकान लेकर रहने लगे। उनका समय अध्ययन-अध्यापन और शास्त्रचर्चा में व्यतीत होता था।
काशी के बाद उच्चकोटि के विद्वानों से उनका संम्पर्क था। उन्ही दिनों एक बार काशी पर प्रबल मुस्लिम आक्रमण होने की आशंका बनी। लोग काशी छोड़कर भागने लगे। श्री लक्ष्मण भट्ट भी अपनी धर्मपत्नी इल्लम्मागारू के साथ अपने मूल स्थान आन्ध्र की और चल दिए। उस समय इल्लम्मागारू को सात मास का गर्भ था। उनकी स्थिति प्रवास के लायक नहीं थी, किन्तु काशी छोड ना आवश्यक था, इसलिए वे अपने पति के साथ लम्बे प्रवास पर निकल पडी।यात्रा लम्बी और कष्टप्रद थी।
इल्लम्मागारू काफी थक गई। फिर भी प्रवास जारी रखना ही था, अतः वे चलती रही। संवत १५३५ वैशाख कृष्ण ११ को ये लोग मध्यप्रदेश के (वर्तमान छत्तीसगढ़) रायपुर के पास चम्पारण्य नामक स्थान पर पहुँचे।
लगातार प्रयास के श्रम और थकान के कारण इल्लम्मागारू को असमय में ही प्रसव-वेदना होने लगी। इन्हे वही रूकना पडा। वही रात्रि से समय से पूर्व इल्लम्मागारू को प्रसव हो गया। नवजात शिशु न तो रोया और न उसमें किसी प्रकार की चेष्टा ही मालूम पडी। रात्रि के उस अन्धकार मे उस बालक को मृतक मानकर वस्त्र में लपेटकर श्री लक्ष्मण भट्ट ने वृक्ष के कोटर में रख श्री लक्ष्मण भट्ट और इल्लम्मागारूजी ने सौ सोमयज्ञ पूर्ण होने पर भगवान् के अवतार के दिव्य सपने संजोये थे। किन्तु यह क्या हो गया? सौ सोमयज्ञ का फल मृत शिशु! वे अत्यन्त दुःखी हुए। अन्ततः वे उस अरण्य (जंगल) से आगे बढे और निकट के गांव में जाकर विश्राम करने लगे। माता का हृदय तो मानों दुःख से टूट ही गया था। उनका वात्सल्यभरा आस्तिक मन स्वीकार ही नहीं कर पा रहा था कि सौ सोमयज्ञों के फलस्वरूप प्राप्त देवी सन्तान मृत हो सकती है। उनकी आँसूभरी आँखों में नींद नहीं थी, किन्तु लक्ष्मण भट्ट को झपकी लग गयी। तभी उन्हे स्वप्न आया। स्वप्न में भगवान् कह रहे थे-'जिस नवजात शिशु को आप मृत जानकर छोड कर आये है उसके रूप में तो मै स्वयं ही तुम्हारे घर पधारा हूँ। लक्ष्मण भट्ट चौकंकर जग गये। उन्होने इल्लम्मागारू को कहा देवी दुःखी मत हो, हमारा शिशु जीवित है।
शिशु के रूप में भगवान् ही पधारे है। चलो, हम वही लौट चले,जहाँ शिशु को छोड कर आये है। उस देवी शिशु को लेकर आवें। दोनो चल दिये वे उसी वृक्ष के पास पहुँचे। प्रभात होने को था। वे यह देखकर आश्चर्य चकित हो गये कि उस वृक्ष के चारों ओर अग्निकुण्ड के समान आग जल रही है। ममतामयी माँ ने आग की परवाह नहीं की। दौड़कर अपने लाल को छाती से लगा लिया। शिशु जीवित और सकुशल था। माँ के स्तनों से दूध झरने लगा। वह बालक को छाती से चिपकाये हुए थी। उनके नैत्रों से हर्ष के आँसू झर रहे थे। लक्ष्मण भट्ट भी आनन्दमग्न थे।
इस प्रकार श्री वल्लभाचार्य जी का अलौकिक, दिव्य प्राकट्य वैशाख कृष्ण एकादशी वि.स. १५३५/1535 (ईस्वी सन् १४७८/1478) को हुआ।   ....................आगे पढ़ें


श्री वल्लभाचार्य जी

।। श्री महाप्रभु जी ।।


प्रथम श्रीवल्लभाचार्यचरण भूतलपर प्रगटे तामें हेतु प्रकृति मंडलते परे अक्षर ब्रह्माके विषे व्याप्त वैकुंठ भगवतधाम है ताके गोलोकधाम नाम करके वेद पुराणादिकमें वर्णन है तहां रमणकर्ता श्रीकृष्ण भगवान  एक समयमें करुणारस वशहोयके विचार करते भये। हमारा आत्मानुभावप्रभाव वेद उपनिषदके विषे जो शुध्दाव्दैत मत है। सो संप्रति भूतलके विषे तिरोहित होय गयाहै। मायावादिनने वेदकी श्रुतिनके अर्थको अनर्थ किया है तातें भगवतधर्म लुप्त भयोहै। सो शुध्दाव्दैत मत प्रगट करने के लिए और पुष्टि भक्तियोग को दान देने के लिए और देवीजीव को उध्दार करने के लिए मैं प्रकट होऊं। -----------------------------------------------------------------------------------------ब्राह्मणोत्पत्तिमार्तण्ड   

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    शुद्धाद्वैत ब्रह्मवाद के व्याख्या और पुष्टिमार्ग के संस्थापक श्रीमद् वल्लभाचार्यजी का प्राकट्य वैशाख कृष्ण एकादशी वि.स. १५३५/1535 (ईस्वी सन् १४७८/1478) को हुआ था।
                          
आपके पिता श्री लक्ष्मण भट्ट और माता इल्लम्मागारू थे। आपके परिवार का मूलतः स्थान आंध्रप्रदेश के खम्मन् के निकट कांकडवाड़ नामक गांव था। आप तैलंग ब्राह्मण थे और कृष्ण यजुर्वेद की तैतरीय शाखा के अन्तर्गत आपका भारद्वाज गौत्र था। आपका परिवार धार्मिक निष्ठा वाला था। आपके परिवार में कई पीढियों से वैदिक सोमयज्ञों की-

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-परम्परा चल रही थी। आपके पूर्वज श्री यज्ञनारायण भट्ट ने परिवार में सोमयज्ञ की परम्परा आरम्भ की। उन्हे भगवान् का यह वरदान मिला था कि सौ सोम यज्ञ पूर्ण होने पर मैं आपके परिवार में अवतार लूँगा इस वरदान के सफल होने की प्रतीक्षा में परिवार में पाँच पीडियों तक सोमयज्ञों की अखंड परम्परा चलती रही।

                          सोमयज्ञों की सूची :-
        1. श्री यज्ञनारायण जी भट्ट - 32
        2. श्री गंगाधन भट्ट - 28
        3. श्री गणपति भट्ट - 30
        4. श्री बालम भट्ट - 5
        5. श्री लक्ष्मण भट्ट - 5

श्री लक्ष्मणभट्ट से पाँच पीढी पूर्व इस काल में श्री-

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-यज्ञनारायण भट्ट ने ३२/32 सोमयज्ञ किये। इनके पुत्र श्री गंगाधन भट्ट ने २८/28, इनके पुत्र श्री गणपति भट्ट ने ३०/30, इनके पुत्र श्री बालम भट्ट ने ५/5 और इनके पुत्र श्री लक्ष्मण भट्ट ने ५/5 सोमयज्ञ किये।
श्री वल्लभाचार्य के पिता के समय सोमयज्ञों की संखया पूरी हुई। तब श्री वल्लभाचार्यजी का प्राकट्य हुआ।

प्राकट्य

वंश में पाचवी पीढ़ी में श्री लक्ष्मण भट्ट का जन्म हुआ। ये भी अपने पूर्वजों के समान उद्भट विद्वान् थे। इनका विवाह विजयनगर के धर्माधिकारी सुधर्मा की पुत्री इल्लम्मागारू के साथ हुआ। इस दम्पती के रामकृष्ण नाम का एक पुत्र ओर सरस्वती तथा सुभद्रा नाम की दो पुत्रियाँ हुई।

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इस समय तक श्री लक्ष्मण भट्ट पांच सोमयज्ञ पूर्ण कर चुके थे। इनकी पूर्ति के साथ ही इस वंश का सौ सोमयज्ञ करने का संकल्प पूरा हो चुका था। श्री लक्ष्मण भट्ट बृहद ब्रह्मभोज का संकल्प लेकर काशी आये। उनके मन मे इस बात से अत्यधिक प्रसन्नता थी कि अब सौ सोमयज्ञ पूर्ण हो जाने पर इनके परिवार में भगवान् का प्राकट्य होगा। श्री लक्ष्मण भट्ट काशी में हनुमानघाट पर एक मकान लेकर रहने लगे। उनका समय अध्ययन-अध्यापन और शास्त्रचर्चा में व्यतीत होता था। काशी के बाद उच्चकोटि के विद्वानों से उनका संम्पर्क था। उन्ही दिनों एक बार काशी पर प्रबल मुस्लिम आक्रमण होने की आशंका बनी। लोग काशी छोड़कर भागने लगे। श्री लक्ष्मण भट्ट भी अपनी धर्मपत्नी इल्लम्मागारू के साथ अपने मूल स्थान आन्ध्र की और चल दिए। उस समय इल्लम्मागारू को सात मास-

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-का गर्भ था। उनकी स्थिति प्रवास के लायक नहीं थी, किन्तु काशी छोड ना आवश्यक था, इसलिए वे अपने पति के साथ लम्बे प्रवास पर निकल पडी।यात्रा लम्बी और कष्टप्रद थी। इल्लम्मागारू काफी थक गई। फिर भी प्रवास जारी रखना ही था, अतः वे चलती रही। संवत १५३५ वैशाख कृष्ण ११ को ये लोग मध्यप्रदेश के (वर्तमान छत्तीसगढ़) रायपुर के पास चम्पारण्य नामक स्थान पर पहुँचे। लगातार प्रयास के श्रम और थकान के कारण इल्लम्मागारू को असमय में ही प्रसव-वेदना होने लगी। इन्हे वही रूकना पडा। वही रात्रि से समय से पूर्व इल्लम्मागारू को प्रसव हो गया। नवजात शिशु न तो रोया और न उसमें किसी प्रकार की चेष्टा ही मालूम पडी। रात्रि के उस अन्धकार मे उस बालक को मृतक मानकर वस्त्र में लपेटकर श्री लक्ष्मण भट्ट ने वृक्ष के कोटर में रख दिया।

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श्री लक्ष्मण भट्ट और इल्लम्मागारूजी ने सौ सोमयज्ञ पूर्ण होने पर भगवान् के अवतार के दिव्य सपने संजोये थे। किन्तु यह क्या हो गया? सौ सोमयज्ञ का फल मृत शिशु! वे अत्यन्त दुःखी हुए। अन्ततः वे उस अरण्य (जंगल) से आगे बढे और निकट के गांव में जाकर विश्राम करने लगे। माता का हृदय तो मानों दुःख से टूट ही गया था। उनका वात्सल्यभरा आस्तिक मन स्वीकार ही नहीं कर पा रहा था कि सौ सोमयज्ञों के फलस्वरूप प्राप्त देवी सन्तान मृत हो सकती है। उनकी आँसूभरी आँखों में नींद नहीं थी, किन्तु लक्ष्मण भट्ट को झपकी लग गयी। तभी उन्हे स्वप्न आया। स्वप्न में भगवान् कह रहे थे-'जिस नवजात शिशु को आप मृत जानकर छोड कर आये है उसके रूप में तो मै स्वयं ही तुम्हारे घर पधारा हूँ। लक्ष्मण भट्ट चौकंकर जग गये। उन्होने इल्लम्मागारू को कहा देवी दुःखी मत हो,

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हमारा शिशु जीवित है। शिशु के रूप में भगवान् ही पधारे है। चलो, हम वही लौट चले,जहाँ शिशु को छोड कर आये है। उस देवी शिशु को लेकर आवें। दोनो चल दिये वे उसी वृक्ष के पास पहुँचे। प्रभात होने को था। वे यह देखकर आश्चर्य चकित हो गये कि उस वृक्ष के चारों ओर अग्निकुण्ड के समान आग जल रही है। ममतामयी माँ ने आग की परवाह नहीं की। दौड़कर अपने लाल को छाती से लगा लिया। शिशु जीवित और सकुशल था। माँ के स्तनों से दूध झरने लगा। वह बालक को छाती से चिपकाये हुए थी। उनके नैत्रों से हर्ष के आँसू झर रहे थे। लक्ष्मण भट्ट भी आनन्दमग्न थे।
इस प्रकार श्री वल्लभाचार्य जी का अलौकिक, दिव्य प्राकट्य वैशाख कृष्ण एकादशी वि.स. १५३५/1535 (ईस्वी सन् १४७८/1478) को हुआ।   ....................आगे पढ़ें

नमामि यमुनामहं सकल सिद्धि हेतुं मुदा ।
मुरारि पद पंकज स्फ़ुरदमन्द रेणुत्कटाम ।।

श्री कृष्ण: शरणं ममः