श्रीमद् वल्लभाचार्य महाप्रभु जी
।। श्री महाप्रभु जी ।।
नवजात शिशु को लेकर पिता लक्ष्मण भट्ट और माता इल्लम्मागारू चौडानगर गये। वहां के प्रमुख कृष्णदास आपके पूर्व परिचित थे। श्री लक्ष्मण भट्ट के आशीर्वाद से उन्हे पुत्र प्राप्त हुआ था। उन्होने श्री लक्ष्मण भट्ट का स्वागत किया। कुछ दिनों तक वे वहीं ठहरे। नामकरण संस्कार में बालक का नाम वल्लभ रखा गया। वे कुछ दिनों बाद दक्षिण में अपने प्रदेश आन्ध्र की ओर बढ ने की तैयारी कर रहे थे, तभी उन्हे ये समाचार मिले कि काशी पर आया हुआ संकट टल गया है, इसलिए लक्ष्मण भट्ट ने पुनः काशी की ओर प्रस्थान किया। छः मास की उम्र में श्री वल्लभ का अन्नप्राशन संस्कार हुआ। उस समय उनके सामने अनेक प्रकार की वस्तुएँ रखी गई। उन वस्तुओं मे से शिशु वल्लभ ने खिलौने आदि वस्तुएँ न उठाकर पुस्तक उठाई। इससे सभी उपस्थित व्यक्तियों ने यह अनुमान लगाया कि यह
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बालक भविष्य में असाधारण विद्वान् होगा। बचपन में जब बच्चे मिलकर राजा-सिपाही आदि का खेल खेलते तब श्री वल्लभ गुरू बनते थे यथा राजा और अन्य सभी को उपदेश देते थे। वे जब भगवान् श्रीकृष्ण के गुणों और रसमयी लीलाओं का वर्णन करते तो सभी भावमग्न हो जाते थे। सभी बच्चों पर उसका गहरा प्रभाव होता था। श्री लक्ष्मण भट्ट के घर में अनेक चित्र थे, जिसमे भगवान् श्रीकृष्ण की विभिन्न लीलाएँ चित्रित थी। इनमें एक चित्र रासलीला का भी था। बालक श्री वल्लभ इस रासलीला के चित्र को घंटो निहारा करते थे। भगवान् की रासलीला के दिव्य भावों का श्रीवल्लभ के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। आपने श्रीमद्भागवत पर लिखी गई अपनी सुप्रसिद्ध 'सुबोधिनी' टीका में भगवान् की रासलीला के दिव्य रहस्यों को सुन्दर ढंग से स्पष्ट किया है तथा रासलीला को
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परमफलरूपा माना है। आठवे वर्ष की उम्र में श्रीवल्लभ का यज्ञोपवीत संस्कार हुआ। श्रीवल्लभ ने व्याकरण, साहित्य, न्याय, वेद-वेदांत, पूर्वमीमांसा, योग, सांख्य, आगम-शास्त्र, गीता, भागवत, पंचरात्र, शंकर-रामानुज-मध्व-निम्बार्क आदि आचार्यों के मतों तथा विभिन्न दर्शनों का गहन अध्ययन किया था। आपने जैन-बौद्ध आदि के सिद्धांतों का भी ज्ञान प्राप्त किया। श्री लक्ष्मण भट्ट स्वयं उच्चकोटि के विद्वान् थे और विभिन्न शास्त्रों के विद्वानों से उनका अच्छा सम्पर्क था। आपने अपने पुत्र श्रीवल्लभ को विभिन्न शास्त्रों मर्मज्ञ विद्वानों के पास अध्ययन के लिये भेजा, जिससे कि उन्हे उन शास्त्रों का गंभीर और प्रमाणिक ज्ञान प्राप्त हो सके । सन् १४९० (संवत् १५४६) में जब श्रीवल्लभ ११ वर्ष के ही थे, तब उनके पिता श्री लक्ष्मण भट्ट का देहावसान हो गया। उनके उत्तरकार्य सम्पन्न
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करने के बाद श्रीवल्लभ ने अपनी माताजी के साथ काशी छोड़कर दक्षिण भारत की यात्रा करने का निश्चय किया, क्योकिं उत्तर भारत में अधिकत्तर राज्यों में मुस्लिम साम्राज्य था तथा दक्षिण में विजयनगर में शक्तिशाली सम्राज्य था, जहाँ श्री वल्लभाचार्य के मामा रहते थे। वे राज्य के दानाध्यक्ष थे। वहीं श्री वल्लभाचार्य अपनी माता जी को छोड कर सम्पूर्ण भारत का भ्रमण करना चाहते थे। इसके अतिरिक्त एक कारण यह भी था कि दक्षिण भारत शंकर, रामानुज, भास्कर, निम्बार्क, मध्व आदि महान् आचार्यों की जन्म भूमि थी। वहां इन आचार्यो के महत्त्वपूर्ण पीठ थे। श्रीवल्लभ की इच्छा थी कि उन स्थानों पर जाकर भारतीय दर्शन के विभिन्न मतों के विद्वानों से सम्पर्क करें, उनकी चर्चा हो, शास्त्रार्थ हो। श्री वल्लभाचार्य ने तीन बार सारे भारत की यात्रा की। आप यज्ञोपवीत, मृगचर्म,
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दण्ड, कटिमेखला, तुलसी-माला, तिलक, कमण्डल, कोपीन-कटिवस्त्र, उपवस्त्र धारण किये हुए रहते थे। केश जटारूप थे। ये ब्रह्मचारी वेश में थे। पैरों में पादुकाएँ भी नहीं पहनते थे। इन यात्रा को सम्प्रदाय के ग्रन्थों में 'श्रीवल्लभदिग्विजय' तथा 'पृथ्वीपरिक्रमा' के रूप में वर्णित किया गया है। इन यात्राओं से श्रीवल्लभाचार्य को देश की राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिस्थितियों को जानने का अवसर मिला। ये यात्राएँ उनके लिए एक ओर तो शिक्षाप्रद यात्राएँ थी तो दूसरी ओर उनकी ज्ञान-गरिमा के प्रचार-प्रसार और व्यापक प्रभाव का कारण भी बनी।
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- ज्यादा लम्बी चलने वाली झांकी के दर्शन होते हैं। अपरान्ह 3 बजे बाद उत्थापन के दर्शन सायंकालीन दर्शनों की पहली झांकी होती है। इसके बाद भोग शाम के दूसरे दर्शन की संध्या आरती शाम की तीसरी झांकी होती है। शयन अन्तिम - -दर्शन होते हैं, जो काफी समय चलते हैं। मंगल भोग में दूध, मक्खन आदि का भोग लगाया जाता है। श्रृंगार के समय प्रभु को बहुमूल्य वस्त्राभूषणों से सजाया जाता है। उत्थापन के समय प्रभु को जगाने के लिए शंखनाद होता है। भोग में विभिन्न फलों व उच्चकोटि के प्रसाद का भोग लगाया जाता है। संध्या आरती का महत्व राजभोग के समान ही है। शयन के समय आरती होती है तथा सेवा भी ली जाती है। मंदिर में वर्ष भर चलने वाली इन सेवाओं के अतिरिक्त आधा दर्जन विशेष समारोह भी होते हैं। श्रीमद् वल्लभाचार्य जी का जन्म संवत् 1535 की-
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-वैशाख वदी ग्यारस को हुआ था। इसी दिन मध्यान्ह काल में श्री गोवर्द्धन नाथ जी
का मुखारबिन्द प्रगट हुआ। इसीलिए कहा गया है-
          ‘‘श्रीवल्लभ पद रेणुको, नामे हुं बारम्बार।
          तिनप्रताप मन होत है, महामनोरथ चार।।’’
वल्लभाचार्य की जन्मतिथि को महाजयंती के रूप में मनाया जाता है। उनके- -उत्तराधिकारी गुसाई जी विट्ठलनाथ जी की जयंती कृष्ण नवमी का मनाई जाती है। अन्य चार समारोह कृष्ण जन्माष्टमी, रामनवमी, वामन जयंती तथा नृसिंह जयंती पर होते हैं।
दोनों जयंतियों पर ‘पादुकाओं’ को दूध स्नान तथा बाकी चारों कार्यक्रमों में दूध, दही, घी, बूरा व शहद का ‘पंचामृत स्नान’ कराया जाता है।
इस मंदिर में पिछले 40 वर्षों से नित्य सत्संग चल रहा है। श्री बृजालंकार जी बताते हैं कि वैष्णवों को यहां-
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-252 वैष्णवों की वार्ता तथा शिक्षा पत्र सुनाया है। मंदिर की भावी योजनाओं के बारे में पूछने पर श्री बृजालंकार जी तनिक मस्कुराते हुए कहते हैः-
           ‘तस्मादसक्तः सततं कार्य कर्म समाचारं।
           असकर्ता हुयाचरन्कर्मं परमाप्नोति पुरूषः’’ -
अर्थात अनासक्त बनकर हमेशा जीव को करना चाहिए। इसी से वह परमगति को करता है।